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देश की अखंडता का संकट: नफ़रत की राजनीति का चक्रव्यूह और कांग्रेस का राष्ट्रीय विकल्प

लखनऊ2 Jul 2026, 11:04 pm

संपादकीयलखनऊव्यूज़: 54
भारत का संविधान एक ऐसे बहुरंगी और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की बात करता है जहाँ हर नागरिक, चाहे उसकी जाति या मज़हब कुछ भी हो, देश की मुख्यधारा का बराबर का हिस्सा है। लेकिन आज की राजनीति को देखें, तो ऐसा लगता है कि विकास, रोज़गार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों को मज़हब और जाति के मलबे के नीचे दबा दिया गया है। देश में फैल रही नफ़रत की राजनीति केवल चुनावी जीत का ज़रिया नहीं बनी है, बल्कि इसने हमारे आपसी भाईचारे को गहरे घाव दिए हैं। AIMIM का भावुक कार्ड: अल्पसंख्यक समाज का सशक्तिकरण या सियासी अलगाव? ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की कार्यशैली और उसके चुनावी उभार को लेकर आज मुस्लिम समाज के समझदार तबके और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच एक गंभीर चिंता है। पार्टी का दावा है कि वह मुसलमानों और वंचितों को आवाज़ दे रही है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इसके उलट एक आत्मघाती रास्ते की ओर इशारा करती है: ध्रुवीकरण को खाद-पानी: जब राजनीति सिर्फ एक मज़हब के नाम पर और आक्रामक बयानबाज़ी के इर्द-गिर्द सिमट जाती है, तो वह दूसरी तरफ़ के बहुसंख्यक ध्रुवीकरण को और आसान बना देती है। AIMIM के भाषणों की शैली अनजाने में या रणनीतिक रूप से दक्षिणपंथी ताकतों को यह नैरेटिव बनाने का पूरा मौका देती है कि "अल्पसंख्यक एकजुट होकर बहुसंख्यकों के खिलाफ खड़े हो रहे हैं।" 'वोट कटवा' की छवि और सेकुलर ताकतों का कमज़ोर होना: चुनावी गणित गवाह है कि जिन राज्यों में इस पार्टी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, वहाँ धर्मनिरपेक्ष वोटों का बिखराव हुआ। इसका सीधा फ़ायदा उसी दक्षिणपंथी राजनीति को मिला, जिसे रोकने का दावा खुद यह पार्टी करती है। बिहार और उत्तर प्रदेश के पिछले चुनाव इसके बड़े उदाहरण हैं। असली मुद्दों से भटकाव: मुस्लिम समाज का असली संकट अशिक्षा, बेरोज़गारी, आर्थिक पिछड़ापन और सुरक्षा का है। जब कोई दल इन बुनियादी हक़ीक़तों को मज़हबी जज़्बात की चादर से ढँक देता है, तो समाज मुख्यधारा के विकास से और दूर होकर अलगाव का शिकार हो जाता है। भाजपा की बहुसंख्यकवादी राजनीति और अविश्वास का माहौल दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (BJP) की राजनीति का मुख्य आधार हिंदुत्व और बहुसंख्यक राष्ट्रवाद रहा है। पिछले कुछ वर्षों में देश के भीतर ध्रुवीकरण की इस राजनीति ने एक नया रूप ले लिया है, जहाँ हर छोटे-बड़े मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखा जाने लगा है: हाशिए पर ढकेला जाता समाज: राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक अस्मिता के नाम पर एक ऐसा माहौल तैयार किया गया है, जिसमें अल्पसंख्यकों को लगातार बैकफुट पर लाया जा रहा है। नागरिकता के कानून, नाम बदलने की सियासत और रोज़मर्रा के विमर्श में नफ़रत भरे बयानों ने देश के भीतर अविश्वास की एक गहरी खाई खोद दी है। विकास की ओट में ध्रुवीकरण: भले ही सरकार बुनियादी ढांचे और आर्थिक तरक्की के बड़े-बड़े दावे करे, लेकिन चुनावों के नज़दीक आते ही भाषा और मुद्दे पूरी तरह मज़हबी ध्रुवीकरण पर केंद्रित हो जाते हैं। 'हम बनाम वो' की यह राजनीति देश की अखंडता और आपसी सद्भाव पर सीधा प्रहार करती है। क्षेत्रीय दलों का अवसरवाद और जातिवादी राजनीति जब बात धर्मनिरपेक्षता की आती है, तो कई क्षेत्रीय दल खुद को इसका मसीहा घोषित करते हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली का बारीकी से विश्लेषण करने पर उनका दोहरा चेहरा सामने आता है: जातिवाद का खेल: इन दलों ने मज़हब के समानांतर 'जाति' की राजनीति को हथियार बनाया है। अलग-अलग राज्यों में विशिष्ट जातियों के वोट बैंक को संजोने के चक्कर में इन्होंने विकास की व्यापक राजनीति को कभी पनपने ही नहीं दिया। अल्पसंख्यकों को केवल वोट बैंक समझना: क्षेत्रीय दलों ने दशकों तक मुस्लिम समाज को केवल "भाजपा का डर" दिखाकर उनका वोट हासिल किया, लेकिन जब उनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान की बात आई, तो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। इन दलों का न तो कोई राष्ट्रीय नज़रिया है और न ही देश की अखंडता को लेकर कोई ठोस वैचारिक समझ। निष्कर्ष: देश को एकजुट रखने के लिए कांग्रेस ही क्यों एकमात्र विकल्प है? इस पूरे नफ़रत और बिखराव के माहौल में देश के प्रबुद्ध नागरिकों और समाज का यह मानना पूरी तरह तार्किक है कि अखिल भारतीय स्तर पर देश को एकजुट रखने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) से बेहतर और कोई विकल्प नहीं है। इसके पीछे कई ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारण हैं: सबको साथ लेकर चलने की विचारधारा: कांग्रेस का इतिहास और उसकी मूल आत्मा 'समावेशी' रही है। यह पार्टी किसी एक मज़हब या एक विशिष्ट जाति के तुष्टीकरण या नफ़रत पर नहीं टिकी है, बल्कि यह भारत की सतरंगी विविधता का प्रतिनिधित्व करती है। राष्ट्रीय दृष्टिकोण (Pan-India Vision): क्षेत्रीय दल देश को राज्यों और जातियों के टुकड़ों में देखते हैं, जबकि कांग्रेस के पास एक अखिल भारतीय विज़न है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश को एक सूत्र में पिरोने की क्षमता केवल एक ऐसी राष्ट्रीय पार्टी में ही हो सकती है जिसकी जड़ें देश की बुनियादी सोच से जुड़ी हैं। संविधान और संस्थाओं की रक्षा: आज जब देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संवैधानिक संस्थाओं पर संकट है, तब एक मज़बूत राष्ट्रीय विकल्प ही देश को 'नफ़रत की राजनीति' से बाहर निकाल सकता है। देश के विकास, आपसी भाईचारे और आर्थिक सुदृढ़ता के लिए उग्र मज़हबी और संकीर्ण जातिवादी राजनीति को नकारना ही होगा। समय आ गया है कि देश के नागरिक जज़्बात और बहकावे की राजनीति से ऊपर उठकर तथ्यों, विकास और बराबरी के हक़ पर आधारित राजनीति का चयन करें, ताकि भारत की एकता और अखंडता अक्षुण्ण बनी रहे।

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