हम भी जुबान रखते हैं: पत्रकारिता व बेरोजगारी का पोस्टमार्टम?
लखनऊ • 10 Jul 2026, 11:39 pm

उत्तर प्रदेशलखनऊव्यूज़: 171
लखनऊ/बढ़नी,सिद्धार्थनगर। समाज की बुराइयों पर किसी न किसी को पहल करनी ही पड़ेगी, क्यों न हम सबसे पहले अपनी कथित पत्रकार बिरादरी पर ही नजर डालकर बुराइयों का पोस्टमार्टम करें। आजकल शहरों व कस्बों में अखबारों/पत्रकारों की बाढ़ सी आ गई है। बाइकों, कारों पर "प्रेस" लिखा कहीं भी देखा जा सकता है। अधिकांश लोग पत्रकारिता का कखग सीखे नहीं कि अपना अखबार लॉन्च कर बेरोजगारों को खोजकर, लुभावने विज्ञापन का टारगेट देकर अवैतनिक पत्रकार बना देते हैं। राष्ट्रीय पर्वों पर किसी भी कार्यालय में विज्ञापन मांगने वाले ऐसे पत्रकारों की कतार देखी जा सकती है। विज्ञापन के कमीशन से ही इनकी जरूरतें पूरी होती हैं?
इसी सोच में अकेले उ०प्र० में ही 21166 समाचार पत्र-पत्रिकाएं पंजीकृत हैं, जो लगभग सर्कुलेशन पर नहीं, बल्कि विज्ञापन पर ही जिंदा हैं। सैकड़ों अखबार तो बमुश्किल कुछ वर्षों तक चले, पर एक समय ऐसा आया कि कुबेर टाइम्स, रा० सहारा जैसे दर्जनों अखबार हांफकर बंद ही हो गए। प्रदेश में लगभग 30 प्रतिशत अखबार व पत्रिकाएं अब केवल सूचना विभाग में नाम के लिए पंजीकृत हैं, बताया जाता है कि वे चलन में नहीं हैं।
चूंकि ज्यादातर अखबार मालिकों व संपादकों को केवल कमाऊ पूत पत्रकार चाहिए जो विज्ञापन लाए, कमीशन ले और तुम भी खुश, हम भी खुश। बेरोजगारी का आलम यह है कि इंटर, बीए, एमए करके युवा कहां जाएं? तो पत्रकार बनना आसान है। अधिकांशतः अखबारों ने अपने पत्रकार बनने वाले युवाओं से "डिप्लोमा इन जर्नलिज्म" की डिग्री मांगना लगभग बंद ही कर दिया है। ऐसा नहीं है कि सभी पत्रकार भ्रष्ट हैं, ईमानदार पत्रकारों की संख्या भी कम नहीं है। ईमानदार पत्रकारों की बदौलत ही पत्रकारिता की साख और गरिमा अभी तक जिंदा है।
सलाम-सम्मान बनाम हकीकत
शौक में बने पत्रकार बंधुओं से आगाह करने के दो शब्द; उम्र का एक पड़ाव केवल "सलाम-सम्मान" में बिताने के बाद, जब हॉस्पिटल में डॉक्टर महंगी जांच व महंगी दवाओं की पर्ची या बच्चे की महंगी फीस की रसीद पकड़ा देगा, तो वहां याद आएगा कि काश मैंने भी कोई व्यापार, नौकरी या समय से कोई रोजी-रोजगार कर लिया होता, तो आज जरूरत के पैसे के लिए पछतावा नहीं होता।
जब संयुक्त राष्ट्र संघ में शर्मिंदा होना पड़ा...
शिक्षित बेरोजगारों के लिए सरकारें अब तो तमाम योजनाएं चलाती हैं। इन योजनाओं की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक विदेशी मंच पर शर्मिंदगी उठाने के बाद से की गई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ में विश्व के कई गंभीर मुद्दों पर बहस चल रही थी। भारत की प्रधानमंत्री से पूछा गया, "मैडम जी, आपके देश में प्रति वर्ष कितने ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट लड़के-लड़कियां डिग्री प्राप्त करते हैं? कितनों को आपकी सरकार नौकरी, रोजगार या व्यापार देती है? कितने बेरोजगार रहकर सड़कों-चौराहों पर घूमते हैं या गलत कार्यों में लिप्त हो जाते हैं?"
बगल में बैठे गृहमंत्री से मैडम ने पूछा, तो गृहमंत्री ने कहा, "मैडम, इसका आंकड़ा तो हमारे देश में रखा ही नहीं जाता।" मैडम वहां शर्मिंदा हुईं और हॉटलाइन पर आंकड़ा इकट्ठा करने को अधिकारियों से कहा। बगल में बैठे "धर्मयुग मैग्जीन" के पत्रकार ने इसकी रिपोर्टिंग की थी। मैडम गांधी ने वहां से आने के बाद "शिक्षित बेरोजगार योजना" चलाई, जिसमें हाईस्कूल के सर्टिफिकेट पर ₹25,000 के लोन का प्रावधान बैंकों के माध्यम से किया गया था। यह योजना आज भी बड़े पैमाने पर स्वरोजगार हेतु उद्योग विभाग व खादी ग्रामोद्योग विभाग में जारी है। आशय यह है कि समय रहते सजग होकर अपने व परिवार के भविष्य के लिए तदबीर करें।
निष्कर्ष
अति धन की लालसा और समाज सेवा, दोनों एक साथ नहीं चल सकते - गांधी जी
निष्पक्ष - न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।








