बढ़नी कस्बा और सीमावर्ती क्षेत्र में नशे का धड़ल्ले से फल-फूल रहा कारोबार, बर्बाद हो रही युवा पीढ़ी
सिद्धार्थनगर • 10 Jul 2026, 11:41 pm

उत्तर प्रदेशसिद्धार्थनगरव्यूज़: 617
रंगे हाथ भारी मात्रा में पकड़े जाने और आदतन अपराधियों को भी कोर्ट से जमानत मिलना बनी व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना; लत पूरी करने के लिए चोरी की राह पर युवा
ब्यूरो, सिद्धार्थनगर। जनपद के भारत-नेपाल सीमा पर स्थित थाना कोतवाली ढेबरुआ क्षेत्र अंतर्गत बढ़नी कस्बा और इसके आसपास का इलाका इन दिनों स्मैक, नारकोटिक्स दवाओं और नशे के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रतिबंधित इंजेक्शनों की तस्करी का गढ़ बनता जा रहा है। सरहद के इस संवेदनशील इलाके में नशे का यह अवैध कारोबार बिना किसी खौफ के धड़ल्ले से फल-फूल रहा है, जिसके चंगुल में फंसकर क्षेत्र के सैकड़ों बच्चों और युवाओं का भविष्य अंधकार में डूब रहा है। स्थानीय जागरूक नागरिकों का आरोप है कि थाना क्षेत्र में भारी संख्या में लोग इस सिंडिकेट से जुड़कर अपना अवैध साम्राज्य चला रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार एजेंसियों की ढुलमुल नीति के कारण इस पर प्रभावी लगाम नहीं लग पा रही है। हैरानी की बात यह है कि बढ़नी कस्बा अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटा होने के कारण यहाँ एसएसबी (SSB) सहित विभिन्न सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां चौबीसों घंटे तैनात रहती हैं। इसके बावजूद तस्करों द्वारा इतनी बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित नशे की खेप को ठिकाने लगाना सुरक्षा और निगरानी तंत्र की मुस्तैदी पर बड़े सवाल खड़े करता है। क्षेत्र के जागरूक प्रबुद्ध वर्ग ने मांग की है कि युवाओं को इस दलदल से निकालने के लिए सिर्फ कागजी खानापूर्ति के बजाय जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर कठोर और प्रभावी कार्रवाई अमल में लाई जाए।
इस अवैध धंधे के तेजी से दोबारा पैर पसारने के पीछे कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी विडंबना सामने आ रही है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, पुलिस द्वारा तस्करों को रंगे हाथ और भारी व्यावसायिक मात्रा में नशीले पदार्थों के साथ पकड़कर जेल तो भेजा जाता है, लेकिन इसके बावजूद ये शातिर अपराधी कोर्ट से बहुत जल्द जमानत पर छूट जाते हैं। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जो अपराधी पहले भी कई बार उसी NDPS एक्ट के तहत जेल जा चुके हैं और आदतन नशा तस्कर हैं, उन्हें भी न्यायालय द्वारा आसानी से जमानत का लाभ मिल जाता है। पुलिस की कड़ी कार्रवाई और पर्याप्त साक्ष्य जुटाने के दावों के बावजूद वास्तविक अपराधियों का इस तरह बार-बार कोर्ट से छूट जाना पूरी कानूनी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। कोर्ट से बाहर आते ही ये तस्कर पुनः उसी काले कारोबार में पूरी सक्रियता से जुट जाते हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस जानलेवा लत का सबसे वीभत्स रूप युवाओं के बीच बढ़ते अपराधों के रूप में सामने आ रहा है। नशे की इस बुरी लत के आदी हो चुके युवा और किशोर अपनी दैनिक खुराक पूरी करने के लिए छोटी-मोटी चोरियों की राह पकड़ रहे हैं। बताया जाता है कि स्मैक की महज एक पुड़िया (एक बार की खुराक) के लिए इन नशेड़ियों को ₹300 तक खर्च करने पड़ते हैं। दिन भर में कई-कई पुड़िया लेने के फेर में ये युवक बाजार के स्मैक कारोबारियों के ठिकानों पर मंडराते रहते हैं। इस लत के लिए पैसे जुटाने की खातिर वे मोबाइल, बाइक और घरों के बर्तन से लेकर सोने-चांदी के छोटे-मोटे आभूषण तक चुरा रहे हैं या फिर उन्हें नशा कारोबारियों के पास बेहद कम दामों में गिरवी रखकर मौत का यह सामान खरीद रहे हैं। इसके साथ ही, विश्वसनीय सूत्रों से यह भी सूचनाएं मिलती रहती हैं कि बढ़नी कस्बे में संचालित कई मेडिकल स्टोरों पर नियमों को ताक पर रखकर नारकोटिक्स दवाएं और प्रतिबंधित इंजेक्शन नशेड़ियों को भारी मुनाफे पर धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं। स्थानीय जनता का मानना है कि यदि प्रशासन, ड्रग विभाग और न्याय व्यवस्था ने मिलकर इन आदतन अपराधियों तथा प्रतिबंधित दवाएं बेचने वाले मेडिकल स्टोरों के खिलाफ तत्काल सख्त रुख नहीं अपनाया, तो सीमावर्ती क्षेत्र की पूरी युवा पीढ़ी इस जानलेवा दलदल में पूरी तरह समा जाएगी।








