प्रेस का स्टिकर या फर्जीवाड़े का खेल? फर्जी 'प्रेस' वाहनों पर कसना होगा शिकंजा, सिद्धार्थनगर प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग
सिद्धार्थनगर • 1 Aug 2026, 12:20 am

पीपी उपाध्याय,
सिद्धार्थनगर। आज सड़कों पर दौड़ती अनगिनत दोपहिया और चारपहिया गाड़ियों पर बड़े-बड़े अक्षरों में "PRESS" लिखा मिलना आम बात हो चुकी है, लेकिन यह सवाल बेहद मौजूं और कड़वा है कि क्या हर 'प्रेस' लिखी गाड़ी वास्तव में पत्रकारिता के दायित्व का प्रतिनिधित्व कर रही है या फिर यह सिर्फ पुलिस-प्रशासनिक छूट, प्रभाव और अवैध रुतबा चमकाने का जरिया बन चुकी है? सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि मूल रूप से अन्य व्यापारों व अनैतिक कार्यों में लिप्त लोग केवल सुविधा और धौंस जमाकर कानून को ठेंगा दिखाने के लिए अपने वाहनों पर प्रेस का स्टिकर लगाकर बेखौफ घूम रहे हैं, जिससे दिन-रात सीमित संसाधनों में निष्पक्ष और निर्भीक रहकर जनता की आवाज उठाने वाले सच्चे पत्रकारों की साख और विश्वसनीयता पर सीधा चोट पहुंच रहा है। पत्रकारिता महज एक पहचान या स्टिकर नहीं, बल्कि सत्ता, प्रशासन और रसूखदारों की आंखों में आंखें डालकर जनहित के तीखे सवाल पूछने का नैतिक साहस है; लेकिन जब यही पहचान खामोशी, निजी लाभ और कानून से बचने का सौदा बन जाए, तो समाज का विश्वास टूटना तय है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए जागरूक नागरिकों और पत्रकार संगठनों ने पुलिस व जिला प्रशासन से यह पुरजोर मांग की है कि सड़कों पर PRESS लिखकर घूमने वाले वाहनों की सघन चेकिंग अभियान चलाकर त्वरित जांच की जाए, अनाधिकृत व फर्जी तरीके से स्टिकर का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज कर कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई की जाए, तथा मीडिया संगठनों व प्रशासनिक एजेंसियों के समन्वय से अधिकृत पत्रकारों की सूची सार्वजनिक की जाए ताकि प्रेस के नाम पर जारी इस फर्जीवाड़े और समानांतर रुतबे के खेल का हमेशा के लिए खात्मा हो सके।









